व्याकरण किसे कहते है Ι Vyakaran kise kehte hain

Vyakaran kise kehte hain 2023 | व्याकरण किसे कहते है इन हिंदी

क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी बोली या लिखावट के पीछे छिपी संरचनाओं और नियमों का क्या हो सकता है? भाषा की इस संरचना को हम व्याकरण कहते हैं, और यह विश्लेषणात्मक और नियमित रूप से भाषा का अध्ययन करने का एक महत्वपूर्ण पहलु है।

इस ब्लॉग पोस्ट में, हम आपको व्याकरण के महत्व, परिभाषा और इसके मुख्य घटकों के बारे में बताएंगे, जिससे आपको व्याकरण के रहस्यमयी जगत की एक अवलोकन मिलेगा।

Vyakaran kise kehte hain

भाषा किसे कहते हैं?

भाषा उस माध्यम को कहते हैं जिसका उपयोग मानव संवाद में विचारों, भावनाओं, और ज्ञान को संवादित करने के लिए किया जाता है। यह एक साधन होती है जिसके द्वारा लोग आपस में विचार व्यक्त करते हैं और संवाद करते हैं। भाषा वाक्य, शब्द, वर्ण, और ध्वनियों के माध्यम से साझा की जाती है ताकि एक व्यक्ति के विचार दूसरे व्यक्ति तक पहुँच सकें।

भाषा की परिभाषा

भाषा अभिव्यक्ति का एक ऐसा समर्थ साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों को दूसरों पर प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार जाना सकता है। संसार में अनेक भाषाएँ हैं। जैसे – हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, बँगला, गुजराती, पंजाबी, उर्दू, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, फ्रैंच, चीनी, जर्मन इत्यादि।

भाषा के प्रकार

भाषा दो प्रकार की होती है-

1. मौखिक भाषा : आमने-सामने बैठे व्यक्ति परस्पर बातचीत करते हैं अथवा कोई व्यक्ति भाषण आदि द्वारा अपने विचार प्रकट करता है तो उसे भाषा का मौखिक रूप कहते हैं।

2. लिखित भाषा : जब व्यक्ति किसी दूर बैठे व्यक्ति को पत्र द्वारा अथवा पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं में लेख द्वारा अपने विचार प्रकट करता है तब उसे भाषा का लिखित रूप कहते हैं।

व्याकरण किसे कहते हैं? (Vyakaran kise kehte hain)

मनुष्य मौखिक एवं लिखित भाषा में अपने विचार प्रकट कर सकता है और करता रहा है किन्तु इससे भाषा का कोई निश्चित एवं शुद्ध स्वरूप स्थिर नहीं हो सकता।

भाषा के शुद्ध और स्थायी रूप को निश्चित करने के लिए नियमबद्ध योजना की आवश्यकता होती है और उस नियमबद्ध योजना को हम व्याकरण कहते हैं।

व्याकरण एक शास्त्रीय दृष्टिकोण से भाषा का अध्ययन करने वाली शाखा है, जो हमें भाषा की संरचना, वाक्य निर्माण, और व्याकरणिक नियमों की समझ प्रदान करती है। यह शाखा हमें बताती है कि कैसे शब्दों को वाक्यों में व्यवस्थित किया जाता है और उन्हें विभिन्न परियोजनाओं में कैसे व्यक्त किया जाता है।

व्याकरण की परिभाषा

व्याकरण वह शास्त्र है जिसके द्वारा किसी भी भाषा के शब्दों और वाक्यों के शुद्ध स्वरूपों एवं शुद्ध प्रयोगों का विशद ज्ञान कराया जाता है।

भाषा और व्याकरण का संबंध

कोई भी मनुष्य शुद्ध भाषा का पूर्ण ज्ञान व्याकरण के बिना प्राप्त नहीं कर सकता। अतः भाषा और व्याकरण का घनिष्ठ संबंध हैं वह भाषा में उच्चारण, शब्द-प्रयोग, वाक्य-गठन तथा अर्थों के प्रयोग के रूप को निश्चित करता है।

भाषा और व्याकरण दोनों ही मानवीय संवाद की महत्वपूर्ण दो पहलुओं को सूचित करते हैं। भाषा व्यक्ति के विचारों, भावनाओं, और ज्ञान को अद्वितीय रूप से व्यक्त करने का एक माध्यम होती है, जबकि व्याकरण उस भाषा के नियमों और संरचना को परिभाषित करता है जो उसकी भाषा में उपयोग होती है।

भाषा का उद्देश्य जानकारी साझा करने के लिए होता है, जबकि व्याकरण उस जानकारी को संरचित रूप में प्रस्तुत करने का काम करता है। भाषा मानव मन की गहराईयों तक पहुँचने का माध्यम होती है, जबकि व्याकरण उस माध्यम को नियमित और सुव्यवस्थित बनाने में मदद करता है।

व्याकरण भाषा की संरचना, वाक्य रचना, शब्दों के रूप, संख्या, पुरुष, वचन, काल, और विभक्ति आदि के नियमों को शामिल करता है। यह भाषा के नियमों को समझने और सही रूप में वाक्य बनाने में मदद करता है ताकि संवाद स्पष्ट और सुव्यवस्थित रहे।

भाषा और व्याकरण का संबंध बहुत गहरा होता है। व्याकरण नियम तय करता है जिनका पालन करके भाषा को संरचित और सुव्यवस्थित बनाया जा सकता है, जबकि भाषा व्याकरण के नियमों का उपयोग करके अर्थपूर्ण और सार्थक वाक्य बनाती है। इस तरीके से, व्याकरण और भाषा एक-दूसरे के पूरक रूप में काम करते हैं और सही संवाद को सुनिश्चित करने में मदद करते हैं।

व्याकरण के विभाग

व्याकरण के चार अंग निर्धारित किये गये हैं –

1. वर्ण-विचार
2. शब्द-विचार
3. पद-विचार
4. वाक्य विचार

1. वर्ण-विचार:

वर्ण-विचार व्याकरण के पहले अंग को सूचित करता है जिसमें भाषा के आवाज़ीय इकाइयाँ, अर्थ, और वर्णों की विशेषताओं का अध्ययन होता है। इसमें वर्णों के ब्याख्यात्मक विश्लेषण, उनके प्रकार, उच्चारण, और वर्ण-संरचना का अध्ययन शामिल होता है।

हिन्दी भाषा में प्रयुक्त सबसे छोटी ध्वनि वर्ण कहलाती है। जैसे-अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, क्, ख् आदि।

वर्णमाला – वर्णों के समुदाय को ही वर्णमाला कहते हैं। हिन्दी वर्णमाला में 44 वर्ण हैं। उच्चारण और प्रयोग के आधार पर हिन्दी वर्णमाला के दो भेद किए गए हैं, स्वर और व्यंजन :-

i. स्वर – जिन वर्णों का उच्चारण स्वतंत्र रूप से होता हो और जो व्यंजनों के उच्चारण में सहायक हों वे स्वर कहलाते है। ये संख्या में ग्यारह हैं-
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ।उच्चारण के समय की दृष्टि से स्वर के तीन भेद किए गए हैं-
1. ह्रस्व स्वर।
2. दीर्घ स्वर।
3. प्लुत स्वर।

ii. व्यंजन – जिन वर्णों के पूर्ण उच्चारण के लिए स्वरों की सहायता ली जाती है वे व्यंजन कहलाते हैं। अर्थात व्यंजन बिना स्वरों की सहायता के बोले ही नहीं जा सकते। ये संख्या में 33 हैं। इसके निम्नलिखित तीन भेद हैं-
1. स्पर्श
2. अंतःस्थ
3. ऊष्म

2. शब्द-विचार:

एक या अधिक वर्णों से बनी हुई स्वतंत्र सार्थक ध्वनि शब्द कहलाता है। जैसे- एक वर्ण से निर्मित शब्द-न (नहीं) व (और) अनेक वर्णों से निर्मित शब्द-कुत्ता, शेर,कमल, नयन, प्रासाद, सर्वव्यापी, परमात्मा।

इस अंग में शब्दों के रूप, उनके भेद, और उनके बनावटी विशेषताएँ विस्तार से विवेचित होती हैं। शब्द-विचार में शब्दों के भाषायिक परिवर्तन, विशेषण, क्रिया, संज्ञा, क्रियाविशेषण, सर्वनाम, आदि की विवेचना होती है।

3. पद-विचार:

सार्थक वर्ण-समूह शब्द कहलाता है, पर जब इसका प्रयोग वाक्य में होता है तो वह स्वतंत्र नहीं रहता बल्कि व्याकरण के नियमों में बँध जाता है और प्रायः इसका रूप भी बदल जाता है।

इस अंग में भाषा में पदों के प्रकार, उनके संगठन, और उनका प्रयोग विस्तार से परिष्कृत होता है। जब कोई शब्द वाक्य में प्रयुक्त होता है तो उसे शब्द न कहकर पद कहा जाता है। हिन्दी में पद पाँच प्रकार के होते हैं-
1. संज्ञा
2. सर्वनाम
3. विशेषण
4. क्रिया
5. अव्यय

4. वाक्य विचार : 

इस अंग में वाक्य की संरचना, उसके भाषायिक घटक, और वाक्यों का विवेचन किया जाता है। वाक्य-विचार में वाक्य के प्रकार, परस्पर योग्यता, अनुप्रास, संयोजन, विभक्ति, आदि के विषय में अध्ययन किया जाता है।

बोली: भाषा का क्षेत्रीय रूप बोली कहलाता है। अर्थात् देश के विभिन्न भागों में बोली जाने वाली भाषा बोली कहलाती है और किसी भी क्षेत्रीय बोली का लिखित रूप में स्थिर साहित्य वहाँ की भाषा कहलाता है।

लिपि: किसी भी भाषा के लिखने की विधि को ‘लिपि’ कहते हैं। हिन्दी और संस्कृत भाषा की लिपि का नाम देवनागरी है। अंग्रेजी भाषा की लिपि ‘रोमन’, उर्दू भाषा की लिपि फारसी, और पंजाबी भाषा की लिपि गुरुमुखी है।

साहित्य: ज्ञान-राशि का संचित कोश ही साहित्य है। साहित्य ही किसी भी देश, जाति और वर्ग को जीवंत रखने का- उसके अतीत रूपों को दर्शाने का एकमात्र साक्ष्य होता है। यह मानव की अनुभूति के विभिन्न पक्षों को स्पष्ट करता है और पाठकों एवं श्रोताओं के ह्रदय में एक अलौकिक अनिर्वचनीय आनंद की अनुभूति उत्पन्न करता है।

अतः ये चार अंग व्याकरण के अध्ययन को अंशिक और संघटित तरीके से करने में मदद करते हैं ताकि भाषा के नियमों की समझ और संवाद को सुव्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया जा सके।

निष्कर्ष

अंत में, हमारी पोस्ट हिंदी भाषा में व्याकरण के महत्व पर जोर देती है। हमें उम्मीद है कि आपको यह जानकारीपूर्ण और उपयोगी लगा होगा। अगर आपको यह पोस्ट पढ़ना अच्छा लगा है, तो हम आपसे इसे अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर साझा करने का अनुरोध करते हैं।

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